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Born and brought up in a small remote village of district Mandi, Himachal Pradesh, India, Ajay Saklani is an independent filmmaker well known for his debut feature film ‘Saanjh’. Ajay made a mark by releasing the first ever feature film in Himachali language in the history of more than 100 years of Indian cinema. (Click About page for more details)
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एक ख्वाब था हिमाचली सिनेमा का

Saanjh First Himachali Film

लगभग 12 साल पहले, 2005 में जब मैंने सिनेमा में कदम रखा तो हिमाचली सिनेमा का एक ख्वाब देखा था। मन में बस यही ख़याल आता था कि क्या हिमाचल में भी कभी सिनेमा की शुरुआत हो पाएगी? क्योंकि उस समय तक मुझे कोई भी ऐसा व्यक्ति नज़र नहीं आया था जो हिमाचल में सिनेमा के लिए कुछ काम कर रहा हो. और ना ही सरकार की तरफ से हिमाचल में सिनेमा के उत्थान के लिए कोई कदम उठाए गए थे। आँखों में एक ख्वाब था कि काश कोई आगे आए और हिमाचली भाषा में भी फिल्में बननी शुरू हो। उस समय तक मुझे सिनेमा के बारे में कोई जानकारी ना होने के कारण मैं कुछ भी नहीं कर सकता था।

वक़्त के साथ-साथ हिमाचली सिनेमा के बारे में कुछ-कुछ खबरें मिलाने लगी। राजिंदर कौशल जी की फिल्म फुलमु-रांझू से एक नयी रोशनी नज़र आने लगी. परंतु जल्दी ही वह उम्मीद भी ठंडी पड़ गई जब पता चला कि फुलमु-रांझू तकनिकी तौर पर सिनेमा हाल में पहुँच नहीं पायेगी। परंतु मैं यह ज़रूर कहना चाहूंगा कि उस फिल्म के बाद काफी लोगों को फिल्म बनाने का जोश आ गया।

मुझे अच्छे से है वह दिन जब में मंडी बस स्टैंड पर खड़ा था और पास की एक दूकान में लगे फिल्म के एक पोस्टर ने मुझे आकर्षित किया। पोस्टर में लिखा था मंडयाली फिल्म। जब ध्यान से नाम पढ़ा तो एक धक्का सा लगा कि ये कैसा नाम है। उस फिल्म का नाम था ‘फ़िन्निये बणाया भल्ला, सारे ग्रावां पया हल्ला’ (फिन्नी नें भल्ला बनाया और पूरे गांव में शोर मच गया)। नाम पसंद ना आने के बावज़ूद मैं उस फिल्म की सीडी खरीद ली और घर जाकर देखी। ख़ुशी इस बात की थी कि कुछ तो काम हो रहा है और दुःख इस बात का कि ये क्या बनाया जा रहा है।

फिर एक अच्छी खबर आई कि संजीव रतन जी ने एक फिल्म बनाई है जिसे राष्ट्रिय पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। मन में उस फिल्म को देखने की इच्छा हुई। फिल्म का नाम था ‘दिले च वसेया कोई’। लगा कि राष्ट्रिय पुरष्कार प्राप्त करने वाली यह फिल्म तो ज़रूर बड़े परदे तक पहुंचेगी। परंतु जब दिव्य हिमाचल में पढ़ा कि इस फिल्म की भी सीडी बाज़ार में उपलब्ध है तो फिर से उम्मीदें धरी की धरी रह गई। सिनेमा हाल तक तो फिल्म पहुँच नहीं पायी पर सीडी खरीद कर ज़रूर देखी। देखने के बाद अहसास हुआ कि फिल्म निर्माण का स्तर पहले से काफी ऊपर आया था परंतु अभी तक इतना ऊंचा नहीं उठ पाया था कि हिमाचली फिल्म सिनेमा हॉल तक पहुँच पाए. वहीँ एक और दुःख हुआ था कि इस फिल्म का सेंसर सर्टिफिकेट ‘डोगरी’ भाषा में लिया गया था ना कि हिमाचली भाषा में।

उम्मीदें जब टूटती है तो धक्का ज़रूर लगता है परंतु ख़ुशी इस बात की होती है कि कुछ ना कुछ कोशिश ज़रूर चल रही है। एक दिन जब सांझ फिल्म के निर्माण का प्लान कर रहे थे तो ‘राजिंदर कौशल’ जी का फ़ोन आया उनकी अगली फिल्म के लिए। वो नठ-भज्ज नामक फिल्म की शूटिंग शुरू करने वाले थे। फिर से उम्मीद जाएगी और एक वार फिर से टूट गई जब वह फिल्म भी सिनेमा हॉल तक नहीं पहुँच पाई। अभी तक वह फिल्म नहीं देख पाया तो यह बताना मुश्किल है कि सिनेमा हॉल तक ना पहुँच पाने या फिर मोबाइल थिएटर के माध्यम से रिलीज़ करने के बावजूद भी वह फिल्म दर्शक क्यों नहीं खींच पाई।

परंतु 2005 से शुरू हुई इस कहानी में मैंने यह नहीं सोचा था कि ठीक 12 साल बाद मैं खुद एक ऐसी फिल्म बनाऊंगा जी कि आखिरकार हिमाचली सिनेमा को एक बड़े पर्दे पहुंचाने का काम करेगी। आज सबसे बड़ी ख़ुशी इस बात की नहीं है कि मेरी फिल्म जल्दी ही बड़े पर्दे पर रिलीज़ होने जा रही है,बल्कि इस बात की है कि अब जाकर हिमाचली सिनेमा बड़े परदे पर जगह बना पाया है। ‘साँझ’ जल्दी ही हिमाचल और देशभर के सिनेमा हॉल में आने वाली है, उम्मीद है यह फिल्म ना केवल सिनेमा हॉल तक पहुँच रही है बल्कि हिमाचली सिनेमा के लिए एक नए भविष्य का निर्माण भी ज़रूर करेगी।

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