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तेरी माँ की, तेरी बहन की… बोल भारत माँ की जय

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इस लेख के शीर्षक में लिखे शब्दों से यदि किसी को आपत्ति हो तो माफ़ी चाहूँगा परंतु यह शब्द इस समय चल रहे हंगामे के बारे में बात करने के लिए ज़रूरी हैं। देश में एक अस्थिरता का माहौल बना हुआ है जहां धर्म, संस्कृति और राष्ट्रवाद पर लोगों को उपदेश देने वाले लोग हर जगह नज़र आ जायेंगे।

हैरानी की बात यह होती है कि जो लोग संस्कृति की बात करते हैं वही लोग उस समय उस संस्कृति की धज्जियां उड़ा देते हैं जब वो अपनी बात की शुरुआत ही कुछ ऐसे शब्दों से करते हैं जैसे तेरी माँ की, तेरी बहन की, उसकी माँ की, उसकी बहन की…. बगैरह बगैरह और फिर आखिर में बोलते हैं भारत माँ की जय।

यदि यह लोग भारत माँ के सम्मान के लिए लोगों को उनकी माँ बहत की गालियां देना अपना अधिकार समझते हैं तो फिर मुझे रवीश कुमार की वह बात याद आ रही है कि ‘यह भारत माता कोई माता नहीं जब तक इसमें आपकी माँ के साथ साथ मेरी माँ शामिल नहीं।’ माँ तो माँ होती है फिर वो मेरी हो, आपकी हो या उस व्यक्ति की जो इनको गालियां दे दे कर किसी भारत माँ की जय बुलवाने के लिए हमेशा आगे रहता है। मैं अंत में बस इतना ही कहूँगा:

संस्कृति की बात ना कर ऐ नादान,
पहले ले इसको पहचान,
किसी की माँ को गालियां देकर,
मत कर अपनी भारत माँ का व्याख्यान,


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