आस्था में अंधा होता हमारा समाज

Posted by on Jun 25, 2009 in Religion, society

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यह बात अक्सर सुनने में आती है कि हमारे देश में अमीर और भी अमीर होता जा रहा है और गरीब और भी गरीब| लेकिन इससे भी बड़ी बात यह है कि अब हमारे भगवान् लोगों से भी ज्यादा अमीर होते जा रहे हैं| हाल ही में इंडिया टुडे पत्रिका के हिंदी अंक में प्रकाशित लेखआस्था की चमकके सामने मेरी आंखें तो चौंधिया गयी| अमृतसर के स्वर्ण मंदिर और वेल्लूर के श्रीपुरम मंदिर में जड़े करोड़ों रूपए के सोने के बाद अब तिरुपति बालाजी भगवान् मंदिर को भी स्वरण युग में शामिल किया जा रहा है|

तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (TTD) के कार्यकारी अधिकारी, के. वी. रमणाचारी के अनुसार, तिरुपति बालाजी भगवन मंदिर को स्वर्णिम रूप देने में लगभग 12.71 करोड़ रूपए के सोने का इस्तेमाल होगा| 2009-10 में मन्दिर के कार्यों के लिए TTD का बजट 1363 करोड़ रुपये है| जबकि प्रतिवर्ष लगभग 520 करोड़ रुपये का चढावा तिरुपति बालाजी भगवन मन्दिर में चढ़ता है|


क्या
करेंगे हमारे भगवन इतने रुपये कमा कर, जहाँ हमारे देश की आधी से ज्यादा जनसँख्या गरीबी रेखा से नीचे रहती है और उन्हें भरपेट खाना भी नहीं मिलता हो| क्या उन्हें भूखा रखकर हमारे भगवान् खुश रहेंगे| ज़रा नीचे दी इन आंकडों पर एक नज़र डालिए :-


12.71 करोड़ रुपये का सोना = लगभग 31.77 लाख लोगों के लिए एक दिन का भरपेट खाना

520 करोड़ का सालाना चढावा = लगभग 4 करोड़ लोगों को एक महीने तक भरपेट खाना

2009-10 के लिए 1363 करोड़ रुपये का बजट = लगभग 11 करोड़ लोगों के लिए एक महीने तक भरपेट खाना

अब ज़रा एक नज़र डालते हैं योजना आयोग द्वारा किए गए इस सर्वेक्षण पर….


योजना आयोग के अनुसार भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 28.3 प्रतिशत लोग और शहरी क्षेत्रों में 27.5 प्रतिशत लोग अभी भी गरीबी रेखा से नीचे रहते हैं| अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यदि पूरे परिवार की एक दिन की आय $1 ( 45-50 रुपये प्रतिदिन) से कम है तो उसे गरीबी रेखा से नीचे मन जाता है, और यदि किसी परिवार की एक दिन की आय $2 (90-100 रुपये प्रतिदिन) है तो वह परिवार गरीब कहलाता है जबकि भारत में 80 प्रतिशत परिवार इस श्रेणी में आते हैं| वैसे ऊपर दिए गए आंकड़े सरकारी सर्वेक्षण से लिए गए हैं और सरकारी सर्वेक्षण कैसे होते हैं शायद आप सभी अच्छी तरह से जानते ही होंगे|

माफ़ कीजियेगा आपको में मन्दिर की दुनिया से ज़रा किसी और दुनिया में ले गया था परन्तु उसे जानना भी ज़रूरी था| अब जब हमारे देश में कुछ ऐसी स्थिति है तो क्या मंदिरों का इस तरह से और भी अमीर होना कहाँ तक सही है ?

जरा सोचिये?

अजय सकलानी

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Comments

  1. आंकडो को देखकर अचंभित हूं .. क्‍या कहूं ?

  2. swati says:

    sahi kha ajay ji……

    or apne jo data collect kiya hai vo bhi sarahniya hai…….

  3. आपके दिए आंकड़े पढ़कर दिल में क्रोध उमड़ रहा है !
    क्या कहूँ ?

    कुछ हरामखोर अपनी हराम की दौलत का एक छोटा सा हिस्सा मंदिरों में दान करके अपने पापों का प्रायश्चित करते हैं …

    इतनी अच्छी पोस्ट लिखने के लिए
    आपको बधाई !

    आज की आवाज

  4. Haresh says:

    Jyadatar time to woh daan bhi kisi aur hi hetu ke liye hota hai.

    We need to curb the centralization of money in temples and trusts.

    Nice to see someone posting in Hindi and that too in such a beautiful way.

    Keep it up!