खूबसूरती का रंग कौन सा?

Posted by on Jun 3, 2009 in Politics, society

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एक तो हमारे देश में जातियों के आधार पर भेदभाव अभी तक चलता आ रहा है, दूसरा मज़हब के नाम पर| फिरकहीं भाषा ने भेदभाव का रूप अख्तियार किया| अलग – अलग प्रान्तों के लोगों ने एक – दूसरे को तिरस्कार कीनज़रों से देखना शुरू किया| ये सिलसिला सालों पहले शुरू हुआ और आज भी बढ़ता जा रहा है| एक तरफ जहाँशिक्षा ने लोगों को जागरूक करने का काम किया वहीँ फिर दूसरी ओर तकनीक ने बिगाड़ भी दिया| नई तकनीकजहाँ तक हमारे लिए लाभदायक साबित हुई वहीँ कुछ ऐसे रूप भी देखने को मिले जहाँ इसी तकनीक का इस्तेमाल ग़लत कामों के लिए भी हुआ और हो रहा है| तो कुल मिलाकर हम भेदभाव की समस्या से एक रूप में छुटकारा पातेहैं और वहीं ये समस्या दूसरी ओर दूसरे रूप में आ खड़ी होती है| पहले सुनने में आता था की अमेरिका में गोरे औरकाले लोगों के बीच एक बहुत बड़ी दीवार खड़ी हो रही है और वो आज भी नज़र आती है| गाँधी जी जब दक्षिण अफ्रीका में थे तो वहां के हालात भी हम जानते हैं| फिर हमारे ही देश में अंग्रेजों नें भारतियों के साथ भी रंग रूप मेंभेदभाव किया|

लेकिन अब एक नया तरीका निकाला गया है इसी गोरे और काले रंग की पहचान का|
“मेरी पहले शादी नहीं हो रही थी, क्योंकि मेरा रंग काला था”,
“मैं लोगों के बीच में नहीं जा पता था क्योंकि मुझे शर्म आती थी जब वे सभी मेरे काले रंग को देख कर मज़ाक उड़ातेथे”,
“मेरे लिए कई रिश्ते आये पर सभी दरवाजे से ही वापिस चले गये”,
“मुझे पहले कहीं काम नही मिलता था, जहाँ भी जाती बस एक नज़र देख कर ही मुझे काम देने से मन कर दियाजाता था”,
” मैं पहले इसकी वजह से बहुत परेशान रहता था और अपने दोस्तों के बीच भी जाने में शर्म आती थी”,

बगेरह बगेरह……

“पर अब मुझे मिल गया है, रूप अमृत, जिसने मेरी त्वचा को निखारा और मुझे दी एक नई खूबसूरती”
“मैंने ये क्रीम लगाई तो अब मुझे ढेरों रिश्ते आ रहे हैं”

बहेरह बगेरह…….

यहाँ खूबसूरती को एक नया नाम दिया गया और वो है “गोरापन”| यदि आप गोरे हैं तो आप खूबसूरत हैं, औरआपकी शादी भी हो सकती है| फिर आपको अच्छा काम भी मिल सकता है| आप दूसरे लोगों के बीच भी जा सकतेहैं और आपको शर्म भी महसूस नहीं होगी|

क्या यह सीधे सीधे लोगों की व्यक्तिगत ज़िन्दगी के साथ खिलवाड़ नहीं है? आप बाज़ार को अपनी मुठी में रखने केलिए किस तरह का जाल बुनने की कोशिश कर रहे हैं| इन बातों को सामने रख कर बेचारी भोली भाली जनता कोआप अपने उत्पाद बेचने में तो सफल हो रहे हैं पर क्या आप जानते हैं की इसका असर हमारे समाज पर कितनाऔर कैसा पड़ रहा है? जो लोग कभी इन बातों के बारे में सोचते भी नहीं थे, वो भी आज गोरेपन को खूबसूरती सेजोड़ने लगे हैं| इन विज्ञापनों की वजह से आज हमारे देश में गोरे और काले का भेदभाव पनपने लगा है और ये एकनई मुसीबत बनकर सर पर खड़ी हो रही है|

पर सच यह है कि केवल गोरेपन का खूबसूरती ले कोई सीधा नाता नहीं है| अफ्रीका में रहने वाले क्या कोई भीखूबसूरत नहीं होते? अगर हम भारत कि ही बात करें तो आज कितनी ही बॉलीवुड कि अभिनेत्रियाँ हैं जो सांवली हैंऔर किसी भी दूसरी अभिनेत्री से ज्यादा खूबसूरत मानी जाती हैं| बिपाशा बासु, रानी मुखर्जी, काजोल, और भीकई|

तो फिर खूबसूरती का रंग कौन सा हुआ? क्यों हम आज रंगों के आधार पर किसी को खूबसूरत या बदसूरत मानानेलगे हैं? हमें अपनी सोच को बदलना होगा|

अजय सकलानी

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Comments

  1. भैया यह बाजार है
    सपनों का बाजार !!!

    अगर ऐसे ही लोग गोरे हो जाते तो श्रीलंका और दक्षिण भारत में कोई भी काला न होता !

    आज की आवाज

  2. कृपया वर्ड वैरिफिकेशन की उबाऊ प्रक्रिया हटा दें !
    इसकी वजह से प्रतिक्रिया देने में अनावश्यक परेशानी होती है !

    तरीका :-
    डेशबोर्ड > सेटिंग > कमेंट्स > शो वर्ड वैरिफिकेशन फार कमेंट्स > सेलेक्ट 'नो' > सेव सेटिंग्स

  3. Ajay Saklani says:

    धन्यावाद प्रकाश जी, सही कहा आपने बाज़ार है….पर सपनों का नहीं, टूटते, बिखरते और चूर चूर होते सपनों का|

    और आपकी शिकायत मैंने दूर कर दी है word verification वाली….

  4. समय says:

    कुछ विकल्पों पर भी सोचें भाई।
    और बताएं।

    आप की सोच की दिशा ठीक है।
    स्वागत है..

  5. हिंदी ब्लॉग की दुनिया में आपका स्वागत है….

  6. khubsurati insan ke hath me nahi. wah to bas mekup kar sakta hai. narayan narayan

  7. ये काले और गोरेपन का भेद यही बड़ी कम्पनियाँ खडा कर रही है?वरना काले तो हर समय काल में थे…कभी शिकायत नहीं सुनी…!फिर कोई इन गोरेपन की क्रीम बनाने वालों से पूछे की भाई आप अफ्रीका में क्यूँ नहीं बेचते?आपकी क्रीम बिक जायेगी और सरे काले लोग गोरे हो जायेंगे…

  8. Ajay Saklani says:

    समय
    विकल्पों की तलाश में ही तो बहस शुरू हुई है भाई जी| ज्यों-ज्यों बहस बढेगी, विकल्प भी सामने आते जायेंगे|
    रजनीश जी,
    क्यों शिकायत करें आखिर काले किसी से, क्या गलत है उनके रंग में| खूबसूरती रंगों में नहीं बल्कि नज़र और नज़रिए में बस्ती है|

    लोकेन्द्र जी और नारदमुनी जी आपका भी धन्यवाद|

  9. merasamast says:

    प्रिय बन्धु
    जय हिंद
    काले-गोरे का भेद नहीं बस दिल से हमारा नाता है
    कुछ और न आता हो हमको पर प्यार निभाना आता है
    अगर आप अपने अन्नदाता किसानों और धरती माँ का कर्ज उतारना चाहते हैं तो कृपया मेरासमस्त पर पधारिये और जानकारियों का खुद भी लाभ उठाएं तथा किसानों एवं रोगियों को भी लाभान्वित करें

  10. Ajay Saklani says:

    ज़रूर बंधू क्यों नहीं……

  11. Kavyadhara says:

    जब भी कोई बात डंके पे कही जाती है
    न जाने क्यों ज़माने को अख़र जाती है ।

    झूठ कहते हैं तो मुज़रिम करार देते हैं
    सच कहते हैं तो बगा़वत कि बू आती है ।

    फर्क कुछ भी नहीं अमीरी और ग़रीबी में
    अमीरी रोती है ग़रीबी मुस्कुराती है ।

    अम्मा ! मुझे चाँद नही बस एक रोटी चाहिऐ
    बिटिया ग़रीब की रह – रहकर बुदबुदाती है

    ‘दीपक’ सो गई फुटपाथ पर थककर मेहनत
    इधर नींद कि खा़तिर हवेली छ्टपटाती है ।
    @Kavi Deepak Sharma
    http://www.kavideepaksharma.co.in

    http://www.kavideepakharma.com

    http://shayardeepaksharma.blogspot.com

  12. बिलकुल सही कहा आपने मित्र क्योंकि ये बाजार है और मेरे घर पर भी इस विषय पर चर्चा होती रहती है।ये बाजार का असर नहीं है ये असर है अंग्रेजों का क्योंकि गुलामी इस कदर हम पर हावी हो गई है कि पुस्तों की मानसिकता तक बदल गई है। क्यों सही कहा न

  13. Ajay Saklani says:

    शुक्ल जी जहाँ तक गुलामी कि बात है आप सही कह रहे हैं कि वो आज भी हम पर हावी है| पर इसमें अंग्रेजो को मे बिलकुल भी दोष नहीं देना चाहूँगा| मेरा यह मानना है कि हम कभी अंग्रेजों के गुलाम ही नहीं रहे| हम हमेशा से सामंतवाद से दबे रहे हैं और आज भी उसी का असर है| बस यही कहूँगा कि :
    वो कुचलते रहे,
    हम कहराते रहे,
    हमारी चीखो पुकार,
    किसी ने ना सुनी,
    हम सहते रहे,
    वो ख़ुशी ख़ुशी चले गए,
    हम अपनो से ही लाते खाते रहे….

    बहुत अच्छा दीपक जी…धन्यावाद

  14. बड़ी बिडम्बना है! इस देश के पूज्य नायक या अवतार जैसे राम, कृष्ण, अर्जुन आदि सभी साँवले थे और आज भी उसी रूप में प्रिय हैं। लेकिन गोरी चमड़ी के प्रति हमारी आशक्ति भी उतनी ही सान्द्र है।

    बाज़ार तो हमारे अंतर्मन की चाहनाओं का शोषण करता ही है, इसमें कोई नई बात नहीं।

  15. Ajay Saklani says:

    गिरिजेश राव जी सही कहा आपने, गोरी चमडी के प्रति तो हम इतने वफादार हैं, जितने शायद अपने परिवार कि प्रति भी ना हों?

  16. बहुत सुंदर…..आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्‍लाग जगत में स्‍वागत है…..आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्‍दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्‍दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्‍त करेंगे …..हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।