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क्यों बढ़ रहा है सामुदायिक भेदभाव?

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देश में अपना स्वामित्व कायम रखने और उसे बढ़ाने का सबसे अच्छा तरिका है कि देश भाषा और संस्कृति को ख़त्म कर दिया जाये| यह करने से लोग अपने अपने समुदाय से अलग हो जायेंगे और उनकी एकता बिखर जायेगी| पिछले 50 सालों से हमारे देश में यही हो रहा है| इसी कारण से हमारे देश में तकरीवन 300 भाषाएँ और कई आदिवासी समुदाय लुप्त हो गए हैं| इसका सबसे बड़ा नुक्सान या तो आदिवासियों को हुआ है या फिर उन प्रदेशों को जिनकी भाषा को खड़ी बोली का नाम देकर उनमें हिंदी भाषा को लागू कर दिया गया| उतरी और मध्य भारत के लगभग सभी राज्यों में ऐसे हालात पैदा कर दिए गए जिससे वो अपनी भाषा से नफरत करना शुरू कर दें| 

  • जम्मू कश्मीर में कश्मीरी को ख़त्म करने की कोशिश की गयी| इसका सबसे अच्छा तरिका निकाला गया कश्मीरी और डोगरी टाकरी लिपि की जगह देवनागरी लिपि का इस्तेमाल| इसी वजह से कश्मीर रहने वाले हिन्दू और मुसलमानों में फूट पड़ गयी| हिन्दू देवनागरी लिपि को इस्तेमाल करने लगे और मुसलमान उर्दू लीपि को| वहीँ जम्मू क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाली डोगरी टाकरी लिपि भी पूरी तरह ख़त्म कर दी गयी और वह डोगरी भाषा के विनाश की तरफ पहला कदम था|
  • हिमाचल और उत्तराखंड के सभी इलाकों से टाकरी लिपि को ख़त्म करके देवनागरी लिपि का इस्तेमाल किया जाने लगा और यहाँ रहने वाले लोग पहाड़ी भाषा को भुलाकर हिंदी और अंगरेजी अपनाए लगे| आज गाँव गाँव में हिंदी और अंग्रेजी भाषा का इस्तेमाल हो रहा है| लोग अपनी भाषा से दूर हो गए और धीरे धीरे अपनी संस्कृति से भी दूर होते जा रहे हैं|
  • पंजाब नें गुरमुखी लिपि को अपनाकर पंजाबी के विनाश को बचा लिया| 
  • हरियाणा, उत्तर प्रदेश और यहाँ तक कि राजस्थान के साथ भी ऐसा ही हुआ| 

पंजाब उतरी राज्यों में सबसे अच्छा उदहारण है जहां पंजाबी के साथ साथ हिंदी और अंगरेजी भाषाएँ भी इस्तेमाल होती हैं और उन्हें पूरा सम्मान भी दिया जाता है| यही दुसरे राज्यों और उनकी भाषाओँ के साथ भी हो सकता था परन्तु यहाँ के राजनितिक दलों को केंद्र के तलवे चाटने से वक़्त कहाँ मिलता है|


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