ऋतिक या अध्यन की रूह भी कंगना की सोच तक नहीं पहुँच सकती

Posted by on May 4, 2016 in Blog, Indian Cinema

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जब कोई इंसान छोटे-छोटे गाँवों में बचपन गुज़ारकर आगे बढ़ता है तो उसकी सोच और समझ शहरों में रहने, बड़े-बड़े स्कूलों में पढ़ने और बड़ी-बड़ी गाड़ियों में घूमने वालों से कहीं बढ़कर होती है. कंगना रनौत के यह शब्द जितने गहरे हैं उतनी गहरी ऋतिक रोशन या अध्यन सुमन की रूह भी नहीं पहुँच सकती। थोड़ा समय निकलकर ज़रूर पढ़ें।Kangna-Ranaut

क्यों किसी को मेरे साथ खड़ा होना चाहिए? मैं ये अकेले ही कर लूंगी। मेरे बारे में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे मुझे शर्म आये। मैं अपने आस-पास की हर एक चीज़ से इंस्पायर होती हूं। मेरी लाइफ में हाल ही में जो कुछ भी घटा है उसने मुझे भी शॉक किया है। ये सब कुछ बहुत ही ज़्यादा है. मैं इन सब के लिए तैयार नहीं थी।

मुझे नहीं मालूम की क्यूं किसी दिमागी बीमारी से जूझ रहे इंसान को शेम किया जाता है और उसके हालातों के लिए उसे ज़िम्मेदार ठहराया जाता है। इस देश में मेरे पीरियड्स को लेके बातें हो रही हैं। उसे घिनौना बताया जा रहा है।

मेरे पीरियड्स कोई कॉकटेल नहीं हैं। उनमें घिनौना क्या हो सकता है? किसी के भी पीरियड्स घिनौने कैसे हो सकते हैं? अगर किसी मर्द के बॉडी फ्लुइड्स घिनौने नहीं हो सकते तो औरतों के क्यूं? उसी से तो इस दुनिया में नए बच्चे आते हैं। और बच्चे घिनौने नहीं होते। तो पीरियड्स में बहने वाला खून क्यूं?

हम सोसाइटी के तौर पे कहीं भी नहीं खड़े होते। हमारे यहां लड़कियों की कोई इज्ज़त नहीं होती।

अगर मुझे नहीं लगता कि मैंने कुछ ग़लत किया है तो मुझे उसका कोई गम नहीं होता। फिर जितना मर्जी मुझे डायन (witch) बुलाया जाए।

जब मैं छोटी थी तो मुझे एक डर लगता था। मुझे ऐसा लगता था कि अगर मैं एक औरत के तौर पर फ़ेल हो गयी तो मुझे रंडी, डायन, पागल या शायद ड्रग अडिक्ट भी कहा जाएगा। देश के बेहद अंदरूनी जगहों से ज़्यादा ऊंची सोसाइटी में लोग ज़लील हैं।

मैं अक्सर अकेले में रोती हूं। लेकिन ऐसा है कि अब मेरे सामने सिवाय लड़ने के सिवाय दूसरा कोई ऑप्शन नहीं है।

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