कज़री का मुजरा अभी बाकि था…

Posted by on Jun 7, 2009 in My Experiences, society

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सच कहूँ तो प्यार हो गया था मुझे उन दिनों| एक अजीब सी बेचैनी रहती थी| मुशिकिल था मेरे लिए भुलाना उन आँखों को जिनकी खामोशी अचानक मनमोहक हो गयी थी| बस बिडम्बना यह है की उन्हें फिर कभी नहीं देख पाया मैं| (जो मित्र मेरा लेख पहली बार पढ़ रहे हों, वो मेरा पिछला लेखअब लिपस्टिक ही पोतेगी या कस्टमर भी देखेगी…?पहले पढ़ लें, इसे समझाने में आसानी होगी)|
अरुणा और बाकि लड़कियों के साथ कुछ दिन तक रहे हम| उनकी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी के कई पहलू देखने को मिले| दिन तो अरुणा को घुमाने के लिए इंडिया गेट भी लेकर गए| कितनी खुश थी वह, जब तक हम इंडिया गेट पर रहे वह पने बेटे के साथ ही खेलती रही| संध्या और अरुणा काफी अच्छी दोस्त बन गयी थी| और क्यों नहीं अगर संध्या को अपनी फिल्म अपने तरीके से पूरी करनी थी तो कुछ छुपी बातों को जानने के लिए पहले उनसे अच्छी दोस्ती होना ज़रूरी था|

हाँ मैं बात कर रहा था अपने प्यार की| बस अभी उसी और बढ़ रहे हैं| हमारे लिए अभी कुछ और पहलुओं को जानना भी बाकि था| उनमें से एक था मुजरा| भारतीय फिल्मों में हमने काफी देखा था पर असलियत में क्या वह वैसा ही होता है या नहीं ऐसे कई सवाल अभी भी हमारे ज़हन में घूम रहे थे| मुझे कुछ इस तरह का महसूस हो रहा था जैसे की हम वहां जायेंगे और सीढियों से ऊपर चढ़ते हुए धीमे सुर में संगीत सुनाई देगा| फिर वो आवाज़ बढ़ती जायेगी और हम एक बड़े से महल में पहुंचेंगे जहाँ संगीत की महफ़िल सजी होगी| पर अफ़सोस में एक फिल्मकार होने के बाबजूद भी उन करोडों भारतीयों की तरह सोच रहा था जो अपने घर में बैठे हमारी फिल्मों में दिखाई देने वाले मुजरे को ही सच समझ बैठे हैं| आखिर सभी फिल्में सच नहीं दिखाती| मेरे कदम ज्यों ही सीढियों पर पढ़े तो मुझे फिसल जाने का डर सता रहा था| इतना अँधेरा था वहां पर की बस में और संध्या एक दुसरे की आवाज़ ही सुन पा रहे थे| ऊपर की ओर देखते हुए दूर कहीं थोडी सी रोशनी दिखाई दे रही थी| अचानक मेरा हाथ एक रस्सी पर पढ़ा तो समझ आया की ऊपर तक पहुँचने के लिए यहाँ रस्सी का सहारा मौजूद है| और फिर हम किसी तरह से बचतेबचाते उन सीढियों को पार कर गए|

एक कोने में कुछ लड़कियाँ बैठी हुई ताश खेल रही थी और बहुत खुश नज़र रही थी| यहाँ भी एक अम्मा जी थी जो पान चबा रही थी| उन्होंने हमें बुलाया और पूछा की आप वही हो जिनके बारे में NGO वालों ने बताया था? संध्या नें अपनी ही हिंदी में कहाहाँ जी हम वही हैं…” (कुछ उसी तरह जैसे सोनिया गाँधी बोलती हैं)| अम्मा जी नें बबलू को आवाज़ दी और कहा बिछाने के लिए कुछ लेकर , मैडम जी आई हैं अमेरिका से| (उन्हें नहीं पता की अमेरिका और इंग्लैंड में कुछ अलग है) और कहा की मास्टर जी को भी बोल दो की वो लोग गए हैं तो थोडी देर में जाए| मेरी नज़रें अभी भी उस जगह को ढूंढ रही थी जहाँ पर मुजरा होता है| क्योंकि हाँ तो सब वैसा ही नज़र रहा था जैसा हम पिछले कुछ दिनों से देखते रहे हैं| बस वो छोटे छोटे कमरे यहाँ नहीं थे, जिससे यहाँ कुछ तो लग होने के आसार नज़र रहे थे| तब मेरी नज़र एक लड़की पर पड़ी जो मेरी बाईं तरफ चुपचाप बैठी थी| वो बहु खुबसूरत थी खासकर उसकी आँखें| ऐशवर्या राय की आँखों से भी ज्यादा खूबसूरत| वैसे तो मैं कभी लड़कियों के नाम नहीं भूलता और वो भी जब वो खूबसूरत हों, पर जाने क्यों आज भी मुझे उसका नाम याद नहीं रहा| उसके नयन बड़े कज़रारे थे तो मैं उसको कज़री का नाम दे रहा हूँ| कज़री….| बस पहली ही नज़र में मुझे वो भा गयी थी| रोज़ जाने यहाँ कितनी ही लड़कियों को देखा था एक से बढ़कर एक खूबसूरत पर कभी इस तरह से कुछ सोचा नहीं था| पर कज़री की आँखों नें तो लग रहा था बस लूट लिया मुझेदहोश हो गया था मैं| मैं उसे देख ही रहा था की संध्या नें मुझे बगल से कन्धा मारा….stop staring at her (उसे घूरना बंद करो)| अम्मा जी ने उसे बोला की तैयार हो जाओ मास्टर जी आते ही होंगे| और वो सामने एक छोटे से पर्दे के पीछे तैयार होने चली गयी|

अम्मा जी से बात करते हुए पता चला की मुजरा इसी जगह होता है जहाँ हम बैठे थे| वो भी पहले तो हस पड़ी और बोली, ” अरे यहाँ जो पहली बार आता है नावो तुम्हारे जैसा फिल्मो वाला मुजरा ही सोचता है| पर हम यहीं पर अभी थोडी देर में ज़मीं पर दरी बिछायेंगे और बस आस पास कुछ पर्दे लगा देंगे और शुरू हो जायेगा| अभी मास्टर जी भी आते ही होंगे“| पर सबसे अच्छी बात जो अम्मा जी से पता चली वो थी वैश्यावृति को लेकर| उनका कहना था, “हमारे यहाँ केवल नाच होता है बाकि सब के लिए यहाँ इतनी सारी जगहें है ना| जिसका जो मन करे वो करेपर यहाँ नहीं, हमारी लड़कियाँ बस नाचती हैं, जिसे नाच देखना हो वो रुके नहीं तो हम किसी को नहीं रोकते| बस यूं ही वक़्त बीतता जा रहा था| कुछ देर में मास्टर जी भी गए और कज़री भी तैयार हो चुकी थी| तब हमें पता चला की आज कोई भी मुजरा देखने नहीं आएगा, क्योंकि हम कैमरा लेकर जो आये हैं साथ में| संध्या बहुत दुखी थी क्योंकि वो तो एक अच्छा वाला मुजरा फिल्माना चाहती थी| खैर अब कज़री भी तैयार थी और सारी तैयारियां भी हो चुकी थी| मास्टर जी तैयार बैठे थे बस अब कज़री के बहार आने का इंतज़ार था| ज्यों ही पर्दा हटा और कज़री एक हरे रंग का लेहंगा पहन कर बाहर आई| उसने चहरे पर पर्दा किया हुआ था| उसके घुँघरू की झंकार मेरे दिल में उतर रही थी| मैं और संध्या बिच में बैठे हुए थे क्योंकि हम आज की रात मेहमान थे उनके| संध्या नें मुझे बिच में बिठा दिया और बोली…”shez gonna dance for u tonight so enjoy (वो आज की रात तुम्हारे लिए नाचेगी तो फिर मजा लो)|

दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिये, बस एक बार मेरा कहा मान लीजिये“….और फिर कज़री नें पर्दा उठायाक्या आँखें थी वो| अभी भी बस वैसी ही सुन्दर मुझे नज़र रही हैं| कभी नहीं भूल पाउँगा मैं कज़री को……..सच में मुझे प्यार हो गया था उससे|

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Comments

  1. saargarbhit post
    achhi post
    umda post

  2. good yar , i have never seen your writing side n that too so flourished. but yar tell me one thing is this a fiction or real incidence because if it,s a fiction then it need some correction to look more impressive but if it,s real you stuck the right chord cos it hardely matter how old this is but still attract people so bahut badiya lagey raho n you insipered me take blogging seriousely

  3. Ajay Saklani says:

    AlbelaKhatri n creativejhadu….thnx for ur comments. This is based on reality not a fiction so icant change many things according to myself,….but yah writer also provide u some something from his own creativity..

  4. CHARVETI , CHERVETI , CHERVETI , I.E
    CHALTE RAHO CHALTE RAHO , CHALTE RAHO
    USKA MAN TO KARTA KI ACCHANAK APNE GOST KI MAILEE CHAADAR AUD KE SO JAI AUR NEENDO KI DALDAL ME KAHIN KHO JAI PAR WAH AISA NAHI KAR SAKTI THEE , …SHAYAD USME YE SUB KARNE KI HIMMAT NAHI THEE

  5. every think is good…i like that..

  6. paraavaani says:

    prabhaavkaaree lekhan hai aapakaa