भाषा, संस्कृति और अपनापन……

Posted by on Jun 21, 2009 in Art and Culture, My Experiences, society

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हमारे देश के विद्वान् लगातार इस बात पर ज़ोर देते रहते हैं कि हम हिन्दुस्तानी होकर शायद अपनी भाषा हिन्दी को ही भूल गए हैं| हम में दूसरी भाषाओं को आपनाने की होड़ सी लग गयी है| जनवरी माह में, महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा में हिन्दी समय का आयोजन भी हुआ| उस समय लगभग पूरे देश से काफी नामी गिरामी विद्वान् आए और उन्होंने अपनी अपनी बात सब के समक्ष रखी| विश्वविद्यालय के कुलपती श्री विभूती नारायण राय नें सभी के विचारों का स्वागत भी किया| उस समय मेरी जिम्मेवारी कार्यक्रम को फिल्माने की थी तो मैं थोडा थोडा कर सभी के विचारों को सुन पा रहा था| बात हिन्दी को लेकर चल रही थी तो हिन्दी का अवलोकन अलग अलग प्रदेशों, संस्कृतियों और व्यक्तियों के नज़रिए से किया गया| सब ठीक ठाक रहा, और 5 दिन के कार्यक्रम के बाद सभी अपनी अपनी बात कह कर वापिस अपने घरों को लौट गए| कुछ ऐसी बातें भी कह गए जो शायद वो कभी अपनी ज़िन्दगी में भी नहीं अपनाते होंगे| अभी आजकल तो हिन्दी ब्लॉग जगत में लोगों की एक भीड़ सी लग गयी है| हिन्दी ब्लॉग जगत नें लोगों को अपनी बात रखने के लिए एक नया मंच दिया है| हम सब हिन्दुस्तानी है और हमारे लिए हिन्दी पढ़ना और लिखना दोनों ही ज़रूरी है| शायद यही एक साधन है जो हमारे देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने में कारगर होगा| किन्तु मैं यहाँ जो अपने विचार आपके सामने रखना चाहता हूँ, उसका संशय केवल हिन्दी से ही नहीं बल्कि एक ऐसी भाषा और संस्कृति से है जिसे हम अपना मानते आये हैं और जो अभी धीरे धीरे हमारे बीच से कहीं दूर जाती हुई नज़र आ रही है|

मैं यहाँ सबसे पहले अपना उदहारण देना चाहूँगा| मैं हिमचल प्रदेश के जिला मंडी का रहने वाला हूँ| हिमाचल की प्रादेशिक भाषा हिन्दी और पहाड़ी है| सरकारी कामकाज सभी हिन्दी में ही होता है और जनसंचार की भाषा में हिन्दी और पहाड़ी दोनों का ही इस्तेमाल होता है| मंडी की जहाँ तक बात है वहां के लोग अपनी भाषा को मंडयाली कहते हैं| मंडयाली और पहाड़ी एक ही भाषा है बस थोडा सा बदलाव ज़रूर है| हिमाचल को वैसे भाषा के आधार पर दो भागों में बांटा जाता है ऊपरी हिमाचल और निचला हिमाचल| ऊपरी हिमाचल कि जो भाषा है उसे समझना मेरे लिए भी आसान नहीं है| इसमें लाहौल स्पीति, किन्नौर, शिमला के कुछ उपरी भाग शामिल हैं| मेरे लिए मंडयाली सबसे पहले आती है क्योंकि मैं उस जगह का रहने वाला हूँ, फिर दूसरा स्थान मैं पहाड़ी को दूंगा क्योंकि वो भी मेरे ही क्षेत्र की भाषा है| फिर इसके बाद का स्थान मैं हिन्दी को दूंगा क्योंकि वो मेरी राष्ट्र भाषा है| अत: कुछ इस तरह मैं अपने जीवन मैं इन भाषाओं को अलग अलग श्रेणियों में बांटता हूँ| अब यह बात केवल मुझ पर ही लागु नहीं होती बल्कि हर एक इंसान पर लागु होती है| कोई बिहार का रहने वाला पहले अपने छोटे से प्रान्त की भाषा को महत्व देगा, फिर भोजपुरी तथा बाद में हिन्दी| और यह ज़रूरी भी है|

पैदा होने के बाद से जब हम पहली बार कोई शब्द बोलते हैं तो वो माँ होता है| फिर उसके बाद हम दूसरों के साथ संपर्क बनाने के लिए उसी भाषा का प्रयोग करते हैं जो हमारे आस-पास के लोग बोलते हैं| हम उसी भाषा को बोलकर बड़े होते हैं, सोचते समझते हैं| यहाँ तक कि जिन स्कूलों में हम पढ़ते हैं वहां पढ़ाई का माध्यम चाहे कोई भी हो पर जब बात किसी विषय को समझने की होती है तो हम वापिस अपनी ही भाषा में उसे समझते हैं, और हमारे अध्यापक भी हमें हमारी सरल भाषा में ही समझाते हैं| और वही हमारी मात्री भाषा होती है| किन्तु आज जहां हमें उसे बचाने कि ज़रूरत है और समझने की ज़रूरत है, वहीँ पर वो भाषा कहीं न कहीं लुप्त होती नज़र आ रही है| और उसका स्थान एक ऐसी भाषा ले रही है जिसका हमारी भाषा और संस्कृति से कोई रिश्ता ही नहीं है|

गाँव की भाषा में बदलाव

सबसे पहले हम गाँव की ओर एक नज़र डालते हैं| जब हम गाँव में जाते हैं तो वहां हमें आज भी वही भाषा मिलती है जीसे हम कभी छोड़ कर आये थे| बहुत ख़ुशी होती है और ऐसा लगता है जैसे हमारा अपना कुछ खो गया था और अब वापिस मिल गया हो| किन्तु यह भाषा केवल उन्ही लोगों के बीच रह गयी है जो गाँव से कभी बाहर नहीं गए| पर जब हम किसी ऐसे व्यक्ति से बात करते हैं जो बाहर रहता हो या रह कर आया हो तो हमें वो फर्क साफ़ नज़र आता है| क्योंकि वह बाहर किसी शहर में या फिर दूसरी जगह में रहकर आया होता है तो वो वहां की भाषा के बहुत से शब्दों को अपना लेता है| किन्तु उसका मतलब यह नहीं है कि वह अपनी भाषा को भूल गया है| वह उसे कभी नहीं भूल सकता| पर अब वह दूसरों को यह दिखाना या जाताना चाहता है कि वह उनके जैसा नहीं है बल्कि समझदार हो गया है तथा modern (आधुनिक) बन गया है| जब किसी से बात करता है तो जहाँ पहले अम्मा बोला करता था अब मदर (mother) बोलता है| जहाँ कभी बाबूजी बोलता था वह स्थान अब फादर (father) नें ले लिया है| चाचा-चाची या काका-काकी अब अंकल-आंटी बन गए हैं| अच्छी बात यह है कि वह अब अंग्रेजी भी बोलने लगा है पर ग़लत यह है कि वह यह भाषा उनके साथ बोलने लगा है जहाँ इसकी ज़रूरत नहीं है| यहाँ अब वो अपनी गाँव देहात की भाषा छोड़ कर, अंग्रेजी, हिन्दी और दूसरी भाषाओँ के शब्दों का ज्यादा प्रयोग करने लगा है| और यह आदत एक दिन उस से उसकी अपनी भाषा को छीन लेगी, वह अपनी पहचान से दूर हो जायेगा|

वहीँ पर कुछ ग़लती उन माँ बाप की भी है जो अब गाँव से बाहर रहने लगे हैं| मुझे याद है जब पूरे 16 साल तक अपनी भाषा में बात करने और अपने लोगों के बीच रहने के बाद मैं अपने पापा के साथ (मैं बचपन से ही पापा बोलता हूँ) जम्मू में रहने गया था तो वहां कितना अजीब लगता था हिन्दी में बात करना| और आज लगभग 10 साल तक बाहर के लोगों के साथ हिन्दी, पंजाबी और अंग्रेजी में बात करने के बाद भी मेरे घर में केवल और केवल मंडयाली में ही बात होती है| किन्तु दुःख की बात यह है कि माँ बाप अपने बच्चों को आज अपनी भाषा छोड़ कर और हिन्दी भी नहीं बल्कि अंग्रेजी में ही बात करने केलिए प्रोत्साहित करने लगे हैं| आज वही माँ बाप भी अपनी भाषा को भूल गए हैं| कुछ दिन पहले मुझे बहुत दुःख हुआ जब मैंने अपनी छोटी सी भतीजी से फ़ोन पर बात की| वो मुझे बड़े प्यार से चाचू-चाचू कहकर बुलाती थी| किन्तु उस दिन जब मेरे भईया ने उसे फ़ोन दिया तो यह कहा कि ये लो अपने अंकल से बात कर लो| और वह भी मुझसे ठीक से बात नहीं करपाई| ना तो वह अंकल ही बोल पायी और न ही चाचू|

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Comments

  1. Yes, i know English and i am proud that i know that language. And why i should learn Hindi and who said it was or is my language. I belong to Orissa and why should i learn Hindi. Come on, what's the use of this kind of patriotism? I know as many as five languages. Try to explore a vast world through English. Dont show that kind of empty patriotism.

    Language is attached to employment and that language will feed me, i will embrace that. At least give me that freedom. Enough, we have heard and read about this rubbish and it would be better to stop this. Culture is not a fief or a maid servant to direct or drive to a particular job or follow a particular course of action. it has its own course and law of nature. it is dynamic and changes according to time and situation.

    it is high time we should leave this language war and focus on some different thing. I would not prefer any interference on my freedom of language. English is in such a position that no effort in India can uproot this. Once you hate any language you do a disservice towards your language.

    So friend, dont write on this topic as in India this kind of topic is not received well as the reality is different.