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अब लिपस्टिक ही पोतेगी या कस्टमर भी देखेगी…?

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सुबह के 8 बज चुके थे अभी तक एक शांति भरा माहौल बना हुआ था| अरुणा अपने 7 साल के बेटे को नहा धुला कर खाना खिला रही थी| अब तो उसने स्कूल जाना भी बंद कर दिया था| पूनम अपने बाल सुखा रही थी चबूतरे में कड़ी होकर| शीला अभी तक सुबह से नज़र नहीं आई थी, शायद अपने भाई के साथ कहीं चली गयी थी (पिछले दिन उसका भाई आया था मिलने को) और हमने पूछा भी नहीं कि कहाँ है| गीता बस शीशा देखा रही थी और अपने आप को संवारने में लगी हुई थी| मैं खाली बैठा बस उबासी ले रहा था| संध्या (मेरी डायरेक्टर) कैमरे में कुछ सेटिंग करने में व्यस्त थी| इतने में कहीं से अम्मा कि आवाज आई….

“अब लिपस्टिक ही पोतेगी या कस्टमर भी देखेगी…? पता नही क्या हो गया है ध्यान ही नहीं है आजकल धंधे कि ओर ”
” हाँ आती हूँ अम्मा ज़रा सब्र तो करो……”
गीता नें मेरी ओर मुस्कुराते हुए धीमी आवाज़ में कहा ” साले सुबह सुबह आ जाते हैं खुलवाने को…..पर चिकने कभी तूने आना हो ना तो इतनी सुबह मत आना…..” और यह कहकर वह कस्टमर को लेकर उस छोटे से कमरे में चली गयी जहाँ सांस लेने के लिए भी जगह नहीं थी| इसमें एक बेड लगा हुआ था और उसके बगल में एक छोटा सा टेबल भी था| दीवार में दो हेंगर कपड़े लटकाने के लिए और दरवाजे के अन्दर जाते ही एक कंडोम का डिब्बा जोंअक्सर भरा ही रहता है (वहां एक NGO इसे कभी भी खाली नहीं होने देता)|

धीरे-धीरे कस्टमरों का आना बढ़ जाता है और लगभग सभी लड़कियां अपने काम में व्यस्त हो जाती हैं| अरुणा का कहना था कि ” कुछ कस्टमर तो ऐसे हैं जो कई सालों से आ रहे हैं| ना जाने उन्हें यहाँ क्या खिंच लाता है| अब तो ये लड़कियां भी समय के साथ साथ मुरझा गयी हैं| गलियां वही हैं बस दीवारों पर कुछ नए इश्तिहार लग गए हैं| बिजली की तारें आज भी नंगी लटक रही हैं मानो उन्हें इंतज़ार हो किसी की मौत का| बाहर सड़क पर भीड़ थोडी सी और बढ़ गयी है और कुछ दुकानों का अब रूप निखर गया है| पर अन्दर सब वही है| वही अँधेरे कोने, वही बदबू मारते कमरे जहाँ रोज़ न जाने कितनी खावाईशें पूरी होती हैं और कितनी हैं जो अधूरी ही दफ़न हो गयी हैं| पिछले 10 साल से मेरे लिए यहाँ कुछ नहीं बदला| ”

कुछ पल के लिए सब जैसे सुनसान हो गया था इतने में अम्मा वहां आई और बोली कि अभी बाहर 3-4 कस्टमर खड़े हैं| शायद कोई कॉलेज के लौंडे लगते हैं| आपको अगर उनकी फोटो लेनी है तो ऊपर चले जाओ वहां से आ जायेगी पर उन्हें पता नही चलना चाहिए नहीं तो हमारे धंधे पर असर पड़ेगा| आखिर सुबह 6 बजे से बैठे होने के बाद अब जाकर हमारा काम शुरू हुआ था| फिर हम व्यस्त हो गये अपने काम में और वो अपने काम में| पुरा दिन गुज़रा, लोग आते रहे और जाते रहे| सभी लड़कियां एक को खुश करने के बाद बाहर चबूतरे पर चली जाती थीं निचे सड़क से कुछ और कस्टमर बुलाने के लिए| उन्हें विश्वास रहता है कि शायद आज कुछ ज्यादा कस्टमर आये और इसके लिए वे सुबह सुबह भगवान से मनोकामना भी करती हैं|

अरुणा नें भी सुबह 7 बजे एक अच्छी भारतीय स्त्री कि तरह पूजा अर्चना की थी| और अगले दिन शुक्रवार था तो वह संतोषी माता का व्रत भी रखने वाली है| दोपहर को कुछ समय मिलने पर मैंने उससे पूछा था कि वह यहाँ कैसे और क्यों आई? वह दर्द भरी मुस्कराहट के साथ बोली…..”एक बड़ी लम्बी कहानी है और अब तो में भी काफी हद तक भूल गयी हूँ| और वैसे रखा भी क्या है उसमें अब| अब तो बस यही मेरे लिए सब कुछ है|… तुने देखा होगा कि अम्मा हमें किस तरह से डांटती है…पर यह नहीं देखा कि वो हमारी सबसे ज्यादा परवाह भी करती है| बहुत अच्छी है अम्मा| में एक बार भाग कर गयी भी थी पर फिर वापिस आ गयी| बाहर जाने के बाद लगा कि नहीं में यहीं ठीक थी| और अब तो मेरा बेटा भी है मेरे साथ…..”
आँखों में पानी भर आया था उसकी और अपने बेटे के सर पर हाथ फेर रही थी….वह पूरा दिन भर क्या काम करती है, यह उसका बेटा भी जानता है| पर इस सबसे उसे और उसके बेटे को कोई फर्क नहीं पड़ता…वो दोनों ही इस माहौल से अच्छी तरह परिचित हैं…|

संध्या को हिंदी कम आती थी…कभी कभी कुछ शब्द बोल लेती थी| वह भी क्या करे लन्दन में पली बड़ी हुई और आज जब फिल्में बनानी शुरू कि तो यहाँ आ पहुंची थी| कौन क्या बोल रही हैं ये मुझे अंग्रेजी में संध्या को भी बताना पड़ता था| शब्दों को तो में बदल देता था पर भावनाओं का क्या| उनमें छुपे दर्द का क्या| कितना दर्द महसूस होता था मुझे भी जब में उन भावनाओं को शब्दों का रूप देने कि कोशिश करता था और वही आज भी महसूस कर रहा हूँ| अभी भी ऐसा लग रहा है जैसे में वापिस उसी माहौल में पहुच गया हूँ|

पर अब अरुणा खुश थी क्योंकि उसका बेटा अब अकेला नहीं था| एक बॉय फ्रेंड मिल गया था अरुणा को जो कि उसे लगता था कि उसके बेटे का हमेशा ध्यान रखेगा| आखिर वो जानती थी कि वह ज्यादा दिन कि मेहमान नहीं है अब| उसे एड्स हो गया था और जब जांच करवाई तब तक काफी देर हो चुकि थी| वह रोज़ दवाइयां खाती थी और अपने कस्टमर को भनक नही लगने देती कि उसे एड्स था| और वही क्यों यहाँ बहुत सी लड़कियाँ ऐसी थी जिन्हें एड्स था|

दिन भर हम कभी एक लड़की से बात करते तो कभी दूसरी से| एक अपनापन सा लगने लगा था वहां पर| कुछ लड़कियां अब भी मुझे चिकना ही बुलाती थी जबकि कुछ मुझे भैया बुलाने लगी थी अब तक| पर सबसे हैरानी कि बात यह थी कि उनकी नज़र में यह कोई गलत काम नहीं था जो वो कर रही थीं| और अब तो मुझे भी लगने लगा था कि वो बिलकुल सही हैं| आखिर गल़त था क्या उसमें? बस अपने जीने के लिए ही तो वो भी कर रही थी यह सब| कुछ तो अपने घर वालों को हर महीने मनी आर्डर भी भेजती थीं| अपने साथ साथ अपने घर वालों का भी पेट पालती हैं वो| एक अपने आप में ही अच्छा सा संसार है उनका, बस उन अँधेरे काले कमरों तक सिमटा हुआ| नई दिल्ली स्टेशन से आती हुई ट्रेनों की सिटी की आवाज़ के आगे उनकी वो हस्सी भरी फुलकारियाँ दब कर रहा गई हैं…..
कज़री का मुजरा अभी बाकि था…

अजय सकलानी


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Comments (15)

  1. Every human being, of whatever origin, of whatever station, deserves respect. We must each respect others even as we respect ourselves.
    nice……story

  2. I thought that this only happens in movies…….but i feel really said on knowing the fact that its all true………and its sad because i think nobody does it willingly……..

  3. धन्यावाद रजनीश जी, और नेहा आप मेरे ब्लॉग पर आई, मेरा लेख पढा और यही नहीं अपनी टिप्पणी भी लिखी…मुझे बहुत ख़ुशी हुई..धन्यावाद

  4. जिंदगी की कैसी इतनी सच्चाइयां हैं …जिन्हें सब जानते भी नहीं होंगे …लेकिन उन में से एक कड़वी सच्चाई यही है जो आपने यहाँ बयाँ की

  5. धन्यावाद राजेंद्र जी, आपकी टिपण्णी मुझे मिल गयी है, मे आशा करता हूँ कि भविष्य मे भी आपका कीमती शब्द मुझ तक पहुंचाते रहेंगे| धन्यावाद

  6. Saw the same in 'Salaam Bombay'..But now
    I am afraid its the Reality…
    Brutual fuckin' truth..Hats off to u bhaiya fr
    going there and getin' to know the actuality…

  7. thnx nikhil…its reality and only those people know abt it who visit those places..rest all get d missconception…or wrongly provided information by our media or films.

  8. dats nice…apni kalam se sachai ko utaarne kaa sarahniye pryas kiyaa hai aapne…bus kuch trutiyaan chubhi mann ko,,kabhi vistaar se baat karenge

  9. mere paas shabd nahi hai apni bhawna jaatane k liye…..humari nazro mein yeh galat kaam hai lekin in ladkiyo yeh kaam karne par bhi humare samaj ne hi majboor kiya hai ……..yeh kaam unke liye aacha hai kyunki ais kaam k zariye yeh apne aap aur apne parivaar ko paalti hai ………

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