धर्म और संस्कृति – मेरे विचार

Posted by on May 31, 2010 in Art and Culture, Religion

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कुछ दिन पहले की बात है जब मैंने भगत सिंह के विचार अपनी facebook प्रोफाइल पर लिखे थे और उन पर काफी टिप्पणियां भी आई| शायद आप में से कुछ लोगों नें उन्हें पढ़ा भी होगा परन्तु अगर नहीं पढ़ा है तो में यहाँ पर एक बार फिर से लिख देता हूँ| मैंने कुछ इस तरह से लिखा था….
“भगत सिंह का कहना था कि किसी भी राष्ट्र के विकास में वहां की कला, संस्कृति और साहित्य का सबसे महत्वपूर्ण योगदान होता है| और उस राष्ट्र के विकास के लिए ज़रूरी है कि हम कला, संस्कृति और साहित्य के विकास की ओर ख़ास तौर पर ध्यान दें और इने फलने – फूलने का पूरा आसार प्रदान करें|” टिप्पणियां अगर आप पढ़ना चाहें तो मेरी facebook प्रोफाइल पर पढ़ सकते हैं|

उन सभी टिप्पणियों में से एक टिपण्णी के जवाब में मैंने लिखा था कि मेरे लिए संस्कृति धर्म है और जिस धर्म (religion) की आज सभी लोग बात करते हैं मैं उसे नहीं मानता| और फिर एक और सवाल मुझसे पूछा गया जिसके कारण मैं यह लेख लिख रहा हूँ कि “संस्कृति के आधार पर मैं किस धर्म से हूँ?”

सवाल बहुत ही बढ़िया है क्योंकि अगर मैं संस्कृति को ही अपना धर्म मानता हूँ तो फी उसका कुछ न कुछ नाम तो होना ही चाहिए| परन्तु संस्कृति के आधार पर मेरे धर्म का नाम न तो हिन्दू है, न मुस्लिम, न सिक्ख, न ईसाई, न जैन, न बुद्ध और न ही कोई भी और| क्योंकि संस्कृति में धर्म (religion) की तरह कोई नियम और कायदे नहीं होते| संस्कृति का बंटवारा नहीं होता| संस्कृति धर्म की तरह किसी को सिखाई नहीं जाती उसे इंसान खुद सीखता है|

मैं धर्म (religion) को एक संविधान मानता हूँ जो मानव जाति को जीवन जीने का एक ढंग सिखाता है और उसके लिए कुछ नियम और कायदे बनाता है| और इस संविधान में समय के साथ साथ बदलाव लाना बहुत ज़रूरी है नहीं तो वो सड़ और गल जाता है जैसे कि आज सभी धर्मों (religion) के साथ हो चुका है|

अब सवाल संस्कृति क्या है उस पर| तो अगर आप पंजाब में जाकर देखेंगे तो आज भी पहचान नहीं पाएंगे कि कौन हिन्दू है, कौन मुसलमान और कौन सिख? वहाँ भाषा पंजाबी बोलते हैं, पगड़ी सभी लगाते हैं, और पहनावा एक जैसा है| आज देश भर में मुसलमान एक छोटी सी जाली वाली टोपी लगाने लगे हैं जिसे मुसलमान की निशानी मान लिया गया है, परन्तु यह कोई नहीं जानता कि वह 1950 -55 तक पश्चिमी उत्तर प्रदेश की संस्कृति का एक हिस्सा हुआ करती थी और उसे हिन्दू व् मुसलमान सभी लोग लगाते थे| वह किसी एक धर्म की निशानी नहीं थी |

2-3 साल पहले एक फिल्म आई थी, “खुदा के लिए” शायद आप में से किसी नें देखी होगी, उस फिल्म में एक जगह पर नसीरुद्दीन शाह नें कहा था कि “हमने माशरत और मज़हब का ऐसा जोड़ कर दिया है कि यह समझ में नहीं आता कि मज़हब क्या है और माशारत क्या है” वहीँ एक और बात कही थी की “दीन में दाढ़ी है दाढ़ी में दीन नहीं”|

मेरी संस्कृति और मेरा धर्म क्या है यह सवाल अभी अनछुआ रह गया है| मेरे यहाँ वो सभी त्यौहार मनाये जाते हैं जिन्हें हिन्दू धर्म में भी मनाया जाता है परन्तु उन्हें मनाने के कारण वो नहीं हैं जिन्हें हिन्दू धर्म बताता है|

  1. हम दिवाली मनाते हैं शरद ऋतू के आनेऔर धान तथा मक्की की फसल के कटने की ख़ुशी में| उस दिन आग को घर में प्रवेश कराया जाता है ताकि सर्दियों में हम खुशहाल रहा सकें|
  2. हम लोहड़ी मनाते हैं गेहूं पकाने की ख़ुशी में|
  3. हम विश्वकर्मा पूजा भी करते हैं जो कि नया नाम है जबकि उसे पहले से अन्नकूट पूजा कहा जाता है|
  4. हम बैशाखी भी मनाते हैं क्योंकि मैं एक पंजाबी व् पहाड़ी संस्कृति से जुड़ा हुआ हूँ और बैशाखी पंजाब का मुख्य त्यौहार है|
  5. हम पेड़ों की पूजा भी करते हैं क्योंकि मैं एक आदिवासी सभ्यता से भी जुड़ा हुआ हूँ जहां हमारा ज़्यादातर खान पीन जंगलों से हुआ करता था|
  6. मेरे यहाँ शिकार पर भी जाते हैं क्योंकि आदिवासी सभ्यता में शिकार से ही खाने की शरुआत हुई थी|

इन सभी बातों के बाद अब शायद आप ठीक से बता सकते हैं कि मेरे सांस्कृतिक धर्म का क्या नाम है|

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