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अंधी दौड़ की मंज़िल – धुल, मिट्टी और ऊंची इमारतें

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पता नहीं कौन सी ख़ुशी वो वहाँ तलाश रहे हैं, अपनों से दूर उस गन्दी हवा में खांस रहे हैं

देश भर में जहां देखो विकास की बात हो रही है. हर तरफ विकास ही विकास नज़र आ रहा है. परन्तु सवाल यह है कि यह कैसा विकास है जहां हम अपने खूबसूरत गावों को छोड़कर धुल व् मिटटी से घिरी और सूखी ज़मीन पर खड़ी ऊंची इमारतों में खुशियां तलाश रहे हैं? पिछले कुछ समय में बहुत से ऐसे लोगों से मुलाक़ात हुई जो अपने हरे-भरे और साफ़ वातावरण से भरपूर पहाड़ों को छोड़कर चंडीगढ़, मोहाली, जालंधर, नोएडा, ग्रेटर नोएडा और गुरुग्राम (गुड़गांव) जैसे शहरों में खुशियां तलाश रहे हैं.building

धीरे-धीरे यहां पर भी रोज़गार के साधन बन रहे हैं जो लोग अपना व्यवसाय कर रहे हैं उनके लिए तो आज अपने गाँव में बैठकर काम करना भी आसान हो गया है. फिर ना जाने क्यों शहरों में बनी उन बड़ी-बड़ी इमारतों में आशियाना ढूंढने निकल पड़े हैं. वो इमारतें जहां पड़ोसी से भी बात ना हो पाए, जहां ज़िन्दगी चार दीवारी में सिमट कर रहा जाए, जहां चोरी डकैती का डर सताए, जहां अपनो से भी खतरा नज़र आए, फिर कैसे हम लोग आज वहीं जाकर अपना आशियाना बनाएं?

यह बात केवल उनकी नहीं जो आज इन शहरों में काम कर रहे हैं बल्कि उनकी लिए भी है जो काम तो अपने गाँव के आस-पास कर रहे हैं परन्तु घर इन बड़े शहरों में बना रहे हैं. वहाँ  हैं ना ही पौधे, वहाँ ना ठंडी हवा है और ना ही पिने को पानी। वहाँ ना ताज़ा फल मिलते हैं और ना ही ताज़ा सब्जियां। वहाँ ना अपनी भाषा मिलाती है और ना ही त्यौहार। वहाँ ना प्यार मिलता है और ना ही दोस्ती। यह सब तो छोड़ो वहाँ ना तो ठीक से सुबह होती है और ना ही रात हो पाती है.


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