ये कैसा ज़माना है?

Posted by on May 20, 2010 in Poetry, Politics, society

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डॉक्टर साहब बच्चा बीमार है,
इलाज करवाना है,

 
क्या तेरे पास पैसे का खजाना है ?
 

नहीं डॉक्टर साहब अभी कमाना है,

 
अजीब पागल है,
फिर बच्चे को कैसे बचाना है ?

बस आप ही का सहारा है डॉक्टर साहब,
मुझे अपना बच्चा नहीं गवाना है,

 
मैंने कसम खाई है,
बिना पैसे वाले को अस्पताल में नहीं बुलाना है,

पर इसकी माँ का बुरा हाल है,
मुझे उसे और नहीं रुलाना है,

………….इतने में एक नेता वहाँ आया और बोला….

 
ऐ अंधे,
पढ़ नहीं सकते वहाँ लिखा है,
यहाँ शोर नहीं मचाना है,

नेता जी मैं क्या करूं,
मुझे तो बाप होने का फ़र्ज़ निभाना है,

…………कुछ देर तक चले इस शब्दों के खेल में ज़िंदगी हार गयी और बच्चे की जान चली गयी | अस्पताल प्रशासन घबरा गया और डॉक्टर बोला….

 
अरे सिक्यूरिटी इसे बाहर निकालो,
मुझे अस्पताल पर बच्चे की मौत का इलजाम नहीं लगाना है,

………….नेता अपनी राजनीति की रोटियाँ सेकते हुए बाप के कंधे पर हाथ रखकर और थोडा दुखी होने का नाटक करके बोला…

 
मैं वादा करता हूँ भाई,
बच्चे की क्रिया-कर्म का खर्च,
मेरी पार्टी नें उठाना है,
पर ये तो बताओ,
बच्चे को जलाना है ?
या फिर दफनाना है????

………….बाप का गला दुःख से भरा हुआ था, अब किन्ही शब्दों के बाहर आने का रास्ता नहीं बचा था…  बाँहों में समेटे हुए अपने बच्चे के मृत शरीर और आँखों से लगातार बहते हुए आंसुओं में, एक दुखी बाप के दिल से निकलते उस सवाल को मैं समझ सकता था…

ये कैसा ज़माना है…
भाई ये कैसा ज़माना है?????

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