मुर्दों का मलाल, काश हमें लकड़ी से नहीं कचरे से जला देते

Posted by on Apr 12, 2016 in Featured, My Experiences, Society & Culture

Continue

बनारस में गंगा किनारे दिन रात जलती चिताओं की varanasi-ghats-cremationअग्नि कभी शांत नहीं होती। हर दिन ना जाने कितने ही मुर्दों को वहाँ मुखाग्नि दी जाती है. देश भर से लोग अपने-अपने परिजनों की आखिरी इच्छा का सम्मान करते हुए तथा उनकी आत्मा की मोक्ष प्राप्ति के लिए उनके पार्थिव शरीर को लेकर बनारस पहुंचते हैं. यहां के शमशान घाट में दिन रात चिताओं के जलने का सिलसिला चलता रहता है.

इस शमशान घाट की कहानी हम मशान हिंदी फिल्म और मशान नामक एक डाक्यूमेंट्री में देख चुके हैं. परन्तु लोगों की भावनाओं से जुड़े इस शहर और देश की पहली ‘स्मार्ट सिटी’ बनारस में धुल, बदबू, कचरे और भीड़ के बीच इंसान अपने आप में असहाय महसूस करता है. शहर में घुस पाना और भीड़ से महर निकल पाना जितना मेहनत का काम है उस से भी कहीं ज़्यादा मेहनत सडकों में बिखरे कचरे और बीच सड़क में कड़ी गायों (गौ माताओं) से खुद को बचाने के लिए करनी पड़ती है. खैर यह कोई नई बात नहीं क्योंकि देश भर में कई शहरों की ऐसी ही कहानी है. INDIA-ENVIRONMENT-POLUTIONबनारस उनमें से कोई अलग शहर नहीं फिर क्या हुआ अगर यहाँ देश का पहला स्मार्ट सिटी बनने जा रहा हो या फिर प्रधानमंत्री का अपना संसदीय क्षेत्र हो या फिर मंदिरों का पवित्र स्थान हो आखिर है तो भारत का ही एक शहर.

चलो इस बात से वापस अपनी मुर्दों वाली बात पर आते हैं. यहां जलने वाले सभी मुर्दे मरने की बाद भी अपने दिल में एक मलाल के साथ इस दुनिया से मुक्ति पाते होंगे। जिस घाट पर उन्हें जलाया जाता है उसके आस-पास सभी घाटों पर बिखरा कचरा उनकी मोक्ष प्राप्ति की राह में ज़रूर रोड़ा बन जाता होगा। यहां इतना कचरा है कि यदि मुर्दों को लकड़ी के बजाय इस कचरे से ही जलाया जाए तो भी कचरे में कमी ना आ पाए. भगवान् उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे और मोक्ष द्वार पर कड़ी उनकी आत्मा को अंदर आने की अनुमति प्रदान करे.

Tags: