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उत्तराखंड त्रासदी : मीडिया का स्वाभाव और श्रधालुओं का वर्ताव, पहाड़ियों के लिए मुसीबत

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पिछले कुछ दिनों में पूरे देश में एक हंगामा सा मचा हुआ है। उतरी राज्यों में भारी बारिश से हुई तबाही से सब कुछ तहस-महस कर दिया है। लाखों लोग कुदरत के इस खेल में नुक्सान झेल रहे हैं। मीडिया में लगातार आ रही खबरों के अनुसार लाखों श्रद्धालु उत्तराखंड में फंसे हुए थे जिन्हें सेना की मदद से निकल जा रहा है। परन्तु यहाँ कुछ सवाल खड़े होते हैं।

  • क्या उत्तराखंड में केवल श्रद्धालू ही थे ओ प्रभावित हुए? वो श्रद्धालु जो 8-10 दिन मुसीबत झेलने के बाद अपने अपने घरों में लौट जायेंगे। स्थानीय निवासियों का क्या? वो मीडिया को नज़र क्यों नहीं आते?
  • फसे हुए श्रधालुओं को उत्तराखंड के लोग खाना बना बना कर खिला रहे हैं। याद रहे की एक पहाड़ी परिवार के घर में बहार से आने वाला हर इंसान एक मेहमान होता है फिर वो किसी संकट में हो या भूला भटका या फिर अपनी ख़ुशी से आया हो। लेकिन ये मेहमान नवाजी न मीडिया को नज़र आ रही है और ना ही श्रधालुओं को। उन्हें अगर नज़र आ रहा है तो बस किसी एक जगह पर लोगों द्वारा उचित मूल्य से कही ज्यादा दाम पर सामान बेचना। एक छोटी सी बात का बतंगड़ बनाना कोई इनसे सीखे।

सवाल यह है कि मीडिया का ऐसा रूप क्यों है? क्या इसलिए कि ज़्यादातर श्रद्धालू पूंजीपति परिवारों से सम्बन्ध रखते हैं?
ज़रा सोचिये उन लोगों के बारे में भी जिनके पूरे गाँव के गाँव इस त्रासदी में बह गए। वो भी इंसान हैं।


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